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सहजोबाई के दोहे Sahjobai Ke Dohe

सहजोबाई सहजोबाई सहजोबाई का परिचय सहजोबाई की जीवनी और विशेषताएँ गुरु-भक्ति का महत्व सहजोबाई के दोहे प्रेम दिवाने जो भये प्रेम लटक दुर्लभ महा अड़सठ तीरथ गुरु चरण गुरुवचन हिय ले धरो मन में तो आनंद है जो आवै सत्संग में सब तीरथ गुरु के चरन सहजोबाई का परिचय सहजोबाई (1725-1805 ई.) मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन की एक महत्त्वपूर्ण संत-भक्त कवयित्री थीं जिस सीधे, सहज और सरल ढंग से अपनी बात कहती हैं वह उन्हें बाकी संत-भक्त कवियों से अलग और ख़ास बनाता है। उनकी एक और विशेषता है उनकी गुरु-भक्ति। गुरु के सम्बन्ध में उनकी धारणा है कि – ‘गुरु न तजूँ हरि को तज डारूँ’ अर्थात् गुरु को नहीं छोड़ूँगी, भले ही इसके लिए ईश्वर को छोड़ना पड़े। सहजोबाई के दोहे प्रेम दिवाने जो भये प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूर। छके रहे घूमत रहैं, सहजो देखि हज़ूर॥ सहजोबाई कहती हैं कि जो व्यक्ति ईश्वरीय-प्रेम के दीवाने हो जाते है...