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Showing posts with the label आरती लिरिक्स

शुक्रवार की आरती / आरती

आरती लक्ष्मण बाल जती की। असुर संहारन प्राणपति की॥ जगमग ज्योति अवधपुरी राजे। शेषाचल पर आप विराजे॥ घंटाताल पखावज बाजै। कोटि देव आरती साजै॥ क्रीटमुकुट कर धनुष विराजै। तीन लोक जाकि शोभा राजै॥ कंचन थार कपूर सुहाई। आरती करत सुमित्रा माई॥ प्रेम मगन होय आरती गावैं। बसि बैकुण्ठ बहुरि नहीं आवैं॥ भक्ति हेतु हरि लाड़ लड़ावै। जब घनश्याम परम पद पावैं॥

गुरुवार की आरती / आरती

ऊँ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा। छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा॥ ऊँ जय बृहस्पति देवा॥   तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ऊँ जय बृहस्पति देवा॥   चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता। सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता॥ ऊँ जय बृहस्पति देवा॥   तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े। प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े॥ ऊँ जय बृहस्पति देवा॥   दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी। पाप दोष सब हर्ता, भव बन्धन हारी॥ ऊँ जय बृहस्पति देवा॥   सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो। विषय विकार मिटाओ, सन्तन सुखकारी॥ ऊँ जय बृहस्पति देवा॥   जो कोई आरती तेरी प्रेम सहित गावे। जेष्टानन्द बन्द सो सो निश्चय पावे॥ ऊँ जय बृहस्पति देवा॥

बुधवार की आरती / आरती

आरती युगल किशोर की कीजै, तन-मन-धन, न्योछावर कीजै। टेक। गौर श्याम सुख निरखत रीझै, हरि को स्वरूप नयन भरी पीजै। रवि शशि कोटि बदन की शोभा। ताहि निरिख मेरो मन लोभा। ओढ़े नील पीत पट सारी, कुंज बिहारी गिरवर धारी। फूलन की सेज फूलन की माला, रत्न सिंहासन बैठे नंदलाला। मोर-मुकुट मुरली कर सोहे, नटवर कला देखि मन मोहे। कंचन थार कपूर की बाती, हरि आए निर्मल भई छाती। श्री पुरुषोत्तम गिरवरधारी, आरती करें सकल ब्रजनारी। नंदनंदन ब्रजभान किशोरी, परमानंद स्वामी अविचल जोरी।

मंगलवार की आरती / आरती

मंगल मूरति जय जय हनुमंता, मंगल-मंगल देव अनंता। हाथ व्रज और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेऊ साजे। शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जगवंदन। लाल लंगोट लाल दोऊ नयना, पर्वत सम फारत है सेना। काल अकाल जुद्ध किलकारी, देश उजारत क्रुद्ध अपारी। रामदूत अतुलित बलधामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा। महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी। भूमि पुत्र कंचन बरसावे, राजपाट पुर देश दिवावे। शत्रुन काट-काट महिं डारे, बंधन व्याधि विपत्ति निवारे। आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हांक ते कांपै। सब सुख लहैं तुम्हारी शरणा, तुम रक्षक काहू को डरना। तुम्हरे भजन सकल संसारा, दया करो सुख दृष्टि अपारा। रामदण्ड कालहु को दण्डा, तुम्हरे परसि होत जब खण्डा। पवन पुत्र धरती के पूता, दोऊ मिल काज करो अवधूता। हर प्राणी शरणागत आए, चरण कमल में शीश नवाए। रोग शोक बहु विपत्ति घराने, दुख दरिद्र बंधन प्रकटाने। तुम तज और न मेटनहारा, दोऊ तुम हो महावीर अपारा। दारिद्र दहन ऋण त्रासा, करो रोग दुख स्वप्न विनाशा। शत्रुन करो चरन के चेरे, तुम स्वामी हम सेवक तेरे। विपति हरन मंगल देवा, अंगीकार करो यह सेवा। मुद्रित भक्त विनती यह मोरी, देऊ महाधन...

सोमवार की आरती / आरती

आरती करत जनक कर जोरे। बड़े भाग्य रामजी घर आए मोरे॥ जीत स्वयंवर धनुष चढ़ाए। सब भूपन के गर्व मिटाए॥ तोरि पिनाक किए दुइ खंडा। रघुकुल हर्ष रावण मन शंका॥ आई सिय लिए संग सहेली। हरषि निरख वरमाला मेली॥ गज मोतियन के चौक पुराए। कनक कलश भरि मंगल गाए॥ कंचन थार कपूर की बाती। सुर नर मुनि जन आए बराती॥ फिरत भांवरी बाजा बाजे। सिया सहित रघुबीर विराजे॥ धनि-धनि राम लखन दोउ भाई। धनि दशरथ कौशल्या माई॥ राजा दशरथ जनक विदेही। भरत शत्रुघन परम सनेही॥ मिथिलापुर में बजत बधाई। दास मुरारी स्वामी आरती गाई॥

रविवार की आरती / आरती

    कहुं लगि आरती दास करेंगे, सकल जगत जाकी जोत विराजे। सात समुद्र जाके चरणनि बसे, कहा भये जल कुम्भ भरे हो राम। कोटि भानु जाके नख की शोभा, कहा भयो मन्दिर दीप धरे हो राम। भार अठारह रामा बलि जाके, कहा भयो शिर पुष्प धरे हो राम। छप्पन भोग जाके नितप्रति लागे, कहा भयो नैवेद्य धरे हो राम। अमित कोटि जाके बाजा बाजे, कहा भयो झनकार करे हो राम। चार वेद जाको मुख की शोभा, कहा भयो ब्रह्म वेद पढ़े हो राम। शिव सनकादिक आदि ब्रह्मादिक, नारद मुनि जाको ध्यान धरे हो राम। हिम मन्दार जाके पवन झकोरें, कहा भयो शिर चंवर ढुरे हो राम। लख चौरासी बन्ध छुड़ाए, केवल हरियश नामदेव गाए हो राम।

श्री प्रेतराज जी की आरती / आरती

जय प्रेतराज कृपालु मेरी, अरज अब सुन लीजिये। मैं शरण तुम्हारी आ गया हूँ, नाथ दर्शन दीजिये। मैं करूं विनती आपसे अब, तुम दयामय चित धरो। चरणों का ले लिया आसरा, प्रभु वेग से मेरा दुःख हरो। सिर पर मोरमुकुट करमें धनुष, गलबीच मोतियन माल है। जो करे दर्शन प्रेम से सब, कटत तन के जाल है। जब पहन बख्तर ले खड़ग, बांई बगल में ढाल है। ऐसा भयंकर रूप जिनका, देख डरपत काल है। अति प्रबल सेना विकट योद्धा, संग में विकराल है। तब भूत प्रेत पिशाच बांधे, कैद करते हाल है। तब रूप धरते वीर का, करते तैयारी चलन की। संग में लड़ाके ज्वान जिनकी, थाह नहीं है बलन की। तुम सब तरह समर्थ हो, प्रभुसकल सुख के धाम हो। दुष्टों के मारनहार हो, भक्तों के पूरण काम हो। मैं हूँ मती का मन्द मेरी, बुद्धि को निर्मल करो। अज्ञान का अंधेर उर में, ज्ञान का दीपक धरो। सब मनोरथ सिद्ध करते, जो कोई सेवा करे। तन्दुल बूरा घृत मेवा, भेंट ले आगे धरे। सुयश सुन कर आपका, दुखिया तो आये दूर के। सब स्त्री अरु पुरुष आकर, पड़े हैं चरण हजूर के। लीला है अदभुत आपकी, महिमा तो अपरंपार है। मैं ध्यान जिस दम धरत हूँ, रच देना मंगलाचार है। सेवक गणेशपुरी महन्त जी, की लाज...

श्री अन्नपूर्णा देवी जी की आरती / आरती

    बारम्बार प्रणाम मैया बारम्बार प्रणाम जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहां उसे विश्राम। अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो, लेत होत सब काम॥ प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम। सुर सुरों की रचना करती, कहाँ कृष्ण कहं राम॥ चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारू चक्रधर श्याम। चन्द्र चूड़ चन्द्रानन चाकर, शोभा लखहि ललाम॥ देवी देव। दयनीय दशा में, दया दया तब जाम। त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल, शरणरूप तब धाम॥ श्री ह्रीं श्रद्धा भी ऐ विधा, श्री कलीं कमला काम। कानित भ्रांतिमयी कांतिशांति, सयीवर दे तू निष्काम॥

श्री रामायण जी की आरती / आरती

    आरती श्री रामायण जी की। कीरत कलित ललित सिय पिय की। गावत ब्रह्मादिक मुनि नारत। बाल्मीक विज्ञानी विशारद। शुक सनकादि शेष अरु सारद। वरनि पवन सुत कीरति निकी। संतन गावत शम्भु भवानी। असु घट सम्भव मुनि विज्ञानी। व्यास आदि कवि पुंज बखानी। काग भूसुनिड गरुड़ के हिय की। चारों वेद पूरान अष्ठदस। छहों होण शास्त्र सब ग्रन्थ्न को रस। तन मन धन संतन को सर्वस। सारा अंश सम्मत सब ही की। कलिमल हरनि विषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ती जुवती की। हरनि रोग भव भूरी अमी की। तात मात सब विधि तुलसी की।

श्री चन्द्र जी की आरती / आरती

ॐ जय श्रीचन्द्र यती, स्वामी जय श्रीचन्द्र यती। अजर अमर अविनाशी योगी योगपती। सन्तन पथ प्रदर्शक भगतन सुखदाता, अगम निगम प्रचारक कलिमहि भवत्राता। कर्ण कुण्डल कर तुम्बा गलसेली साजे, कंबलिया के साहिब चहुँ दीश के राजे। अचल अडोल समाधि प्झासा सोहे बालयती बनवासी देखत जग मोहे। कटि कौपीन तन भस्मी जटा मुकुट धारी, धर्म हत जग प्रगटे शंकर त्रिपुरारी। बाल छबी अति सुन्दर निशदिन मुस्काते, भ विशाल सुलोचन निजानन्दराते। उदासीन आचार्य करूणा कर देवा, प्रेम भगती वर दीजे और सन्तन सेवा। मायातीत गुसाई तपसी निष्कामी, पुरुशोत्तम परमात्म तुम हमारे स्वामी। ऋषि मुनि ब्रह्मा ज्ञानी गुण गावत तेरे, तुम शरणगत रक्षक तुम ठाकुर मेरे। जो जन तुमको ध्यावे पावे परमगती, श्रद्धानन्द को दीजे भगती बिमल मती। अजर अमर अविनाशी योगी योगपती। स्वामी जय श्रीचन्द्र यती

श्री गीता जी की आरती / आरती

करो आरती गीता जी की॥ जग की तारन हार त्रिवेणी, स्वर्गधाम की सुगम नसेनी। अपरम्पार शक्ति की देनी, जय हो सदा पुनीता की॥ ज्ञानदीन की दिव्य-ज्योती मां, सकल जगत की तुम विभूती मां। महा निशातीत प्रभा पूर्णिमा, प्रबल शक्ति भय भीता की॥ करो० अर्जुन की तुम सदा दुलारी, सखा कृष्ण की प्राण प्यारी। षोडश कला पूर्ण विस्तारी, छाया नम्र विनीता की॥ करो०॥ श्याम का हित करने वाली, मन का सब मल हरने वाली। नव उमंग नित भरने वाली, परम प्रेरिका कान्हा की॥ करो०॥

श्री जुगलकिशोर जी की आरती / आरती

आरती जुगलकिशोर की कीजै। तन मन धन न्यौछावर कीजै। रवि शशि कोटि बदन की शोभा। ताहि निरखि मेरी मन लोभा। गौर श्याम मुख निखरत रीझै। प्रभु को स्वरूप नयन भरि पीजै। कंचन थार कपूर की बाती। हरि आए निर्मल भई छाती। फूलन की सेज फूलन की माला। रतन सिंहासन बैठे नन्दलाला। मोर मुकुट कर मुरली सोहे। नटवर वेष देखि मन मोहे। ओढ़यो नील-पीत पटसारी, कुंज बिहारी गिरवरधारी। आरती करत सकल ब्रजनारी। नन्दनन्दन वृषभानु किशोरी। परमानन्द स्वामी अविचल जोड़ी। आरती जुगल किशोर की कीजै।

श्री संणु जी की आरती / आरती

धूप दीप घुत साजि आरती। वारने जाउ कमलापति। मंगलाहरि मंगला। नित मंगल राजा राम राई को। उत्तम दियरा निरमल बाती। तुही निरंजन कमला पाती। रामा भगति रामानंदु जानै। पूरन परमानन्द बखानै। मदन मूरति भै तारि गोबिन्दे। सैणु भणै भजु परमानन्दे।

श्री चिन्तपूर्णी देवी जी की आरती / आरती

चिन्तपूर्णी चिन्ता दूर करनी, जन को तारो भोली माँ॥ काली दा पुत्र पवन दा घोडा, सिंह पर भई असवार, भोली माँ॥१॥ एक हाथ खड़ग दूजे में खांडा, तीजे त्रिशूलसम्भालो, भोली माँ॥२॥ चौथे हथ चक्कर गदा पांचवे, छठे मुण्डों दी माल भोली माँ॥३॥ सातवें से रुण्ड-मुण्ड बिदारे, आठवें से असुर संहारे, भोली माँ॥४॥ चम्पे का बाग लगा अति सुन्दर, बैठी दीवान लगाय, भोली माँ॥५॥ हरि हर ब्रह्मा तेरे भवन विराजे, लाल चंदोया बैठी तान, भोली माँ॥६॥ औखी घाटी विकटा पैंडा, तले बहे दरिया, भोली माँ॥७॥ सुमर चरन ध्यानू जस गावे, भक्तां दी पज निभाओ, भोली माँ॥८॥

श्री शाकुंभारी देवी जी की आरती / आरती

हरि ओं शाकुम्भर अम्बा जी, की आरती कीजो ऐसा अदभुत रूप हृदय धर लीजो शताक्षी दयालु की आरती कीजो तुम परिपूर्ण आदि भवानी मां सब घट तुम आप बखानी मां शाकुम्भर अंबा जी की आरती कीजो तुम्हीं हो शाकुम्भरी, तुम ही हो शताक्षी मां शिव मूर्ति माया तुम ही हो प्रकाशी मां नित जो नर नारी अंबे आरती गावे मां इच्छा पूरणकीजो, शाकुम्भरी दर्शन पावे मां जो नर आरती पढ़े पढ़ावे माँ जो नर आरती सुने सुनावे माँ बसे बैकुण्ठ शाकुम्भर दर्शन पावे,

श्री शीतला माता जी की आरती / आरती

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता, आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता॥ जय... रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता, ऋद्धिसिद्धि चंवर डोलावें, जगमग छवि छाता॥ जय... विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता, वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता॥ जय... इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा, सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता॥ जय... घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता, करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता॥ जय... ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता, भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता॥ जय... जो भी ध्यान लगावैं प्रेम भक्ति लाता, सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता॥ जय... रोगन से जो पीड़ित कोई शरण तेरी आता, कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता॥ जय... बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता, ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता॥ जय... शीतल करती जननी तुही है जग त्राता, उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता॥ जय... दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता, भक्ति आपनी दीजै और न कुछ भाता॥ जय...

श्री सालासर बालाजी की आरती / आरती

जयति जय जय बजरंग बाला, कृपा कर सालासर वाला। टेक। चैत सुदी पूनम को जन्मे, अंजनी पवन ख़ुशी मन में। प्रकट भय सुर वानर तन में, विदित यस विक्रम त्रिभुवन में। दूध पीवत स्तन मात के, नजर गई नभ ओर। तब जननी की गोद से पहुंचे, उदयाचल पर भोर। अरुण फल लखि रवि मुख डाला॥ कृपा कर०॥ १॥ तिमिर भूमण्डल में छाई, चिबुक पर इन्द्र बज बाए। तभी से हनुमत कहलाए, द्वय हनुमान नाम पाये। उस अवसर में रुक गयो, पवन सर्व उन्चास। इधर हो गयो अन्धकार, उत रुक्यो विश्व को श्वास। भये ब्रह्मादिक बेहाला॥ कृपा कर॥ २॥ देव सब आये तुम्हारे आगे, सकल मिल विनय करन लागे। पवन कू भी लाए सागे, क्रोध सब पवन तना भागे। सभी देवता वर दियो, अरज करी कर जोड़। सुनके सबकी अरज गरज, लखि दिया रवि को छोड़। हो गया जगमें उजियाला॥ कृपा कर॥ ३॥ रहे सुग्रीव पास जाई, आ गये बनमें रघुराई। हरिरावणसीतामाई, विकलफिरतेदोनों भाई। विप्ररूप धरि राम को, कहा आप सब हाल। कपि पति से करवाई मित्रता, मार दिया कपि बाल। दुःख सुग्रीव तना टाला॥ कृपा कर॥ ४॥ आज्ञा ले रघुपति की धाया, लंक में सिन्धु लाँघ आया। हाल सीता का लख पाया, मुद्रिका दे बनफल खाया। बन विध्वंस दशकंध सुत, वध कर लंक जल...

श्री भैरव जी की आरती / आरती

जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा। जय काली और गौरा कृतसेवा।| तुम पापी उद्धारक दुख सिन्धु तारक। भक्तों के सुखकारक भीषण वपु धारक। वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी। महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी। तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे। चतुर्वतिका दीपक दर्शन दुःख खोवे। तेल चटकी दधि मिश्रित माषवली तेरी। कृपा कीजिये भैरव करिये नहीं देरी। पाँवों घुंघरू बाजत डमरू डमकावत। बटुकनाथ बन बालक जन मन हरषवत। बटुकनाथ की आरती जो कोई जन गावे। कहे ' धरणीधर ' वह नर मन वांछित फल पावे।

श्री काली जी की आरती / आरती

अम्बे तू है जगम्बे काली जय दुर्गे खप्पर वाली। तेरे ही गुण गायें भारती। ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।। तेरे भक्त जनों पे माता भीड़ पड़ी है भारी। दानव दल पार टूट पड़ो मां करके सिंह सावरी।। सौ सौ सिंहों से है बलशाली दस भुजाओं वाली। दुखियो के दुखडें निवारती। ओ मैया... मां बेटे का हैं पर ना माता सुनी कुमाता।। सब पे करूणा दरसाने वाली अमृत बरसाने वाली। दुखियो के दुखडें निवारती। ओ मैया... नहीं माँगते धन और दौलत न चांदी न सोना। हम तो मांगे मां तेरे मन में एक छोटा सा कोना। सबकी बिगड़ी बनाने वाली लाज बचाने वाली सतियों के सत को सँवारती। ओ मैया...

श्री बालकृष्ण जी की आरती / आरती

आरती बालकृष्ण की कीजै। अपनों जनम सुफल करि लीजै। श्रीयशुदा को परम दुलारौ। बाबा की अखियन कौ तारो।। गोपिन के प्राणन को प्यारौ। इन पै प्राण निछावरी कीजै। आरती बालकृष्ण की कीजै।। बलदाऊ कौ छोटो भैया। कनुआँ कहि कहि बोलत मैया। परम मुदित मन लेत वलैया। यह छबि नयननि में भरि लीजै। आरती बालकृष्ण की कीजै।। श्री राधावर सुघर कन्हैया। ब्रजजन कौ नवनीत खवैया। देखत ही मन नयन चुरैया। अपनौ सरबस इनकूं दीजे। आरती बालकृष्ण की कीजै।। तोतरि बोलनि मधुर सुहावै। सखन मधुर खेलत सुख पावै। सोई सुकृति जो इनकूं ध्यावै। अब इनकूं अपनों करि लीजै। आरती बालकृष्ण की कीजै।।