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भैरव चालीसा / चालीसा

दोहा श्री गणपति गुरु गौरि पद प्रेम सहित धरि माथ। चालीसा वन्दन करौं श्री शिव भैरवनाथ॥ श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल। श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल॥ जय जय श्री काली के लाला। जयति जयति काशी- कुतवाला॥ जयति बटुक- भैरव भय हारी। जयति काल- भैरव बलकारी॥ जयति नाथ- भैरव विख्याता। जयति सर्व- भैरव सुखदाता॥ भैरव रूप कियो शिव धारण। भव के भार उतारण कारण॥ भैरव रव सुनि हवै भय दूरी। सब विधि होय कामना पूरी॥ शेष महेश आदि गुण गायो। काशी- कोतवाल कहलायो॥ जटा जूट शिर चंद्र विराजत। बाला मुकुट बिजायठ साजत॥ कटि करधनी घूँघरू बाजत। दर्शन करत सकल भय भाजत॥ जीवन दान दास को दीन्ह्यो। कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो॥ वसि रसना बनि सारद- काली। दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली॥ धन्य धन्य भैरव भय भंजन। जय मनरंजन खल दल भंजन॥ कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा। कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा॥ जो भैरव निर्भय गुण गावत। अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत॥ रूप विशाल कठिन दुख मोचन। क्रोध कराल लाल दुहुँ लोचन॥ अगणित भूत प्रेत संग डोलत। बम बम बम शिव बम बम बोलत॥ रुद्रकाय काली के लाला। महा कालहू के हो काला॥ बटुक नाथ हो काल गँभीरा। श्वेत रक्त अरु श्याम श...

संतोषी चालीसा / चालीसा

दोहा बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार। ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार॥ भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम। कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम॥ जय सन्तोषी मात अनूपम। शान्ति दायिनी रूप मनोरम॥ सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा। वेश मनोहर ललित अनुपा॥ श्वेताम्बर रूप मनहारी। माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी॥ दिव्य स्वरूपा आयत लोचन। दर्शन से हो संकट मोचन॥ जय गणेश की सुता भवानी। रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी॥ अगम अगोचर तुम्हरी माया। सब पर करो कृपा की छाया॥ नाम अनेक तुम्हारे माता। अखिल विश्व है तुमको ध्याता॥ तुमने रूप अनेकों धारे। को कहि सके चरित्र तुम्हारे॥ धाम अनेक कहाँ तक कहिये। सुमिरन तब करके सुख लहिये॥ विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी। कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी॥ कलकत्ते में तू ही काली। दुष्ट नाशिनी महाकराली॥ सम्बल पुर बहुचरा कहाती। भक्तजनों का दुःख मिटाती॥ ज्वाला जी में ज्वाला देवी। पूजत नित्य भक्त जन सेवी॥ नगर बम्बई की महारानी। महा लक्ष्मी तुम कल्याणी॥ मदुरा में मीनाक्षी तुम हो। सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो॥ राजनगर में तुम जगदम्बे। बनी भद्रकाली तुम अम्बे॥ पावागढ़ में दुर्गा माता। अखिल विश्व तेरा...

साईं चालीसा / चालीसा

पहले साईं के चरणों में, अपना शीश नवाऊँ मैं। कैसे शिर्डी साईं आए, सारा हाल सुनाऊँ मैं।। (1) कौन हैं माता, पिता कौन हैं, यह न किसी ने भी जाना। कहाँ जनम साईं ने धारा, प्रश्न पहेली रहा बना ।। (2) कोई कहे अयोध्या के, ये रामचंद्र भगवान है। कोई कहे साईं बाबा, पवन पुत्र हनुमान हैं।। (3) कोई कह्ता मंगलमूर्ति, श्री गजानन हैं साईं। कोई कह्ता गोकुल मोहन-देवकी नंदन है साईं।। (4) शंकर समझ भक्त कई तो, बाबा को भजते रहते। कोई कहे अवतार दत्त का, पूजा साईं की करते।। (5) कुछ भी मानो उनको तुम, पर साईं है सच्चे भगवान। बडे दयालु, दीनबंधु, कितनो को दिया जीवनदान।। (6) कई वर्ष पहले की घटना, तुम्हें सुनाऊँगा मैं बात। किसी भाग्यशाली की, शिर्डी में आई थी बारात।। (7) आया साथ उसी के था, बालक एक बहुत सुंदर। आया, आकार वहीं बस गया, पावन शिर्डी किया नगर।। (8) कई दिनों तक रहा भटकता, भिक्षा माँगी उसने दर-दर। और दिखाई ऐसी लीला, जग में जो हो गई अमर।। (9) जैसे-जैसे उमर बढी, वैसे ही बढती गई शान। घर-घर होने लगा नगर में, साईंबाबा का गुणगान।। (10) दिग दिगंत में लगा नगर में, फिर तो साईं जी का नाम। दीन-दुखी की रक्षा करना, यही रहा ...

शीतला चालीसा / चालीसा

दोहा जय जय माता शीतला तुमही धरे जो ध्यान। होय बिमल शीतल हृदय विकसे बुद्धी बल ज्ञान॥ घट घट वासी शीतला शीतल प्रभा तुम्हार। शीतल छैंय्या शीतल मैंय्या पल ना दार॥ जय जय श्री शीतला भवानी। जय जग जननि सकल गुणधानी॥ गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजती। पूरन शरन चंद्रसा साजती॥ विस्फोटक सी जलत शरीरा। शीतल करत हरत सब पीड़ा॥ मात शीतला तव शुभनामा। सबके काहे आवही कामा॥ शोक हरी शंकरी भवानी। बाल प्राण रक्षी सुखदानी॥ सूचि बार्जनी कलश कर राजै। मस्तक तेज़ सूर्य सम साजै॥ चौसट योगिन संग दे दावै। पीड़ा ताल मृदंग बजावै॥ नंदिनाथ भय रो चिकरावै। सहस शेष शिर पार ना पावै॥ धन्य धन्य भात्री महारानी। सुर नर मुनी सब सुयश बधानी॥ ज्वाला रूप महाबल कारी। दैत्य एक विश्फोटक भारी॥ हर हर प्रविशत कोई दान क्षत। रोग रूप धरी बालक भक्षक॥ हाहाकार मचो जग भारी। सत्यो ना जब कोई संकट कारी॥ तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा। कर गई रिपुसही आंधीनी सूपा॥ विस्फोटक हि पकड़ी करी लीन्हो। मुसल प्रमाण बहु बिधि कीन्हो॥ बहु प्रकार बल बीनती कीन्हा। मैय्या नहीं फल कछु मैं कीन्हा॥ अब नहीं मातु काहू गृह जै हो। जह अपवित्र वही घर रहि हो॥ पूजन पाठ मातु जब करी है। भय आन...

गंगा चालीसा / चालीसा

दोहा जय जय जय जग पावनी जयति देवसरि गंग। जय शिव जटा निवासिनी अनुपम तुंग तरंग॥ चौपाई जय जग जननि अघ खानी, आनन्द करनि गंग महरानी। जय भागीरथि सुरसरि माता, कलिमल मूल दलनि विखयाता। जय जय जय हनु सुता अघ अननी, भीषम की माता जग जननी। धवल कमल दल मम तनु साजे, लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे। वाहन मकर विमल शुचि सोहै, अमिय कलश कर लखि मन मोहै। जडित रत्न कंचन आभूषण, हिय मणि हार, हरणितम दूषण। जग पावनि त्रय ताप नसावनि, तरल तरंग तंग मन भावनि। जो गणपति अति पूज्य प्रधाना, तिहुं ते प्रथम गंग अस्नाना। ब्रह्म कमण्डल वासिनी देवी श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी। साठि सहत्र सगर सुत तारयो, गंगा सागर तीरथ धारयो। अगम तरंग उठयो मन भावन, लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन। तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट, धरयौ मातु पुनि काशी करवट। धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी, तारणि अमित पितृ पद पीढी। भागीरथ तप कियो अपारा, दियो ब्रह्म तब सुरसरि धारा। जब जग जननी चल्यो लहराई, शंभु जटा महं रह्यो समाई। वर्ष पर्यन्त गंग महरानी, रहीं शंभु के जटा भुलानी। मुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो, तब इक बूंद जटा से पायो। ताते मातु भई त्रय धारा, मृत्यु लोक, नभ अरु पातारा। गई पाताल प...

गायत्री चालीसा / चालीसा

ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचण्ड ॥ शान्ति कान्ति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखण्ड ॥ जगत जननी मङ्गल करनि गायत्री सुखधाम । प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥ भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी । गायत्री नित कलिमल दहनी ॥ अक्षर चौविस परम पुनीता । इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥ शाश्वत सतोगुणी सत रूपा । सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥ हंसारूढ सितंबर धारी । स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी ॥ पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला । शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥ ध्यान धरत पुलकित हित होई । सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई ॥ कामधेनु तुम सुर तरु छाया । निराकार की अद्भुत माया ॥ तुम्हरी शरण गहै जो कोई । तरै सकल संकट सों सोई ॥ सरस्वती लक्ष्मी तुम काली । दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥ तुम्हरी महिमा पार न पावैं । जो शारद शत मुख गुन गावैं ॥ चार वेद की मात पुनीता । तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥ महामन्त्र जितने जग माहीं । कोउ गायत्री सम नाहीं ॥॥ सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै । आलस पाप अविद्या नासै ॥॥ सृष्टि बीज जग जननि भवानी । कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥॥ ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते । तुम सों पावें सुरता तेते ॥॥ तुम भक्तन की भक्त त...

विन्ध्येश्वरी चालीसा / चालीसा

दोहा नमो नमो विन्ध्येश्वरी नमो नमो जगदम्ब। सन्तजनों के काज में माँ करती नहीं विलम्ब॥ चालीसा जय जय जय विन्ध्याचल रानी। आदि शक्ति जग विदित भवानी॥ सिंहवाहिनी जै जग माता। जय जय जय त्रिभुवन सुखदाता॥ कष्ट निवारिनी जय जग देवी। जय जय जय जय असुरासुर सेवी॥ महिमा अमित अपार तुम्हारी। शेष सहस मुख वर्णत हारी॥ दीनन के दुःख हरत भवानी। नहिं देख्यो तुम सम कोई दानी॥ सब कर मनसा पुरवत माता। महिमा अमित जगत विख्याता॥ जो जन ध्यान तुम्हारो लावै। सो तुरतहि वांछित फल पावै॥ तू ही वैष्णवी तू ही रुद्राणी। तू ही शारदा अरु ब्रह्माणी॥ रमा राधिका शामा काली। तू ही मात सन्तन प्रतिपाली॥ उमा माधवी चण्डी ज्वाला। बेगि मोहि पर होहु दयाला॥ तू ही हिंगलाज महारानी। तू ही शीतला अरु विज्ञानी॥ दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता। तू ही लक्ष्मी जग सुखदाता॥ तू ही जान्हवी अरु उत्रानी। हेमावती अम्बे निर्वानी॥ अष्टभुजी वाराहिनी देवी। करत विष्णु शिव जाकर सेवी॥ चोंसट्ठी देवी कल्यानी। गौरी मंगला सब गुण खानी॥ पाटन मुम्बा दन्त कुमारी। भद्रकाली सुन विनय हमारी॥ वज्रधारिणी शोक नाशिनी। आयु रक्षिणी विन्ध्यवासिनी॥ जया और विजया बैताली। मातु सुगन्धा अरु विकरा...

सरस्वती चालीसा / चालीसा

जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥ पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु। दुष्टजनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥ जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥ जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥ रूप चतुर्भुज धारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥ जग में पाप बुद्धि जब होती। तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥ तब ही मातु का निज अवतारी। पाप हीन करती महतारी॥ वाल्मीकिजी थे हत्यारा। तव प्रसाद जानै संसारा॥ रामचरित जो रचे बनाई। आदि कवि की पदवी पाई॥ कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥ तुलसी सूर आदि विद्वाना। भये और जो ज्ञानी नाना॥ तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा। केवल कृपा आपकी अम्बा॥ करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥ पुत्र करहिं अपराध बहूता। तेहि न धरई चित माता॥ राखु लाज जननि अब मेरी। विनय करउं भांति बहु तेरी॥ मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥ मधु-कैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥ समर हज़ार पाँच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥ मातु सहाय कीन्ह तेहि काला। बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥ तेहि ते मृत्...

लक्ष्मी चालीसा / चालीसा

दोहा मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास। मनो कामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥ सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार। ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥ सोरठा यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥ चालीसा सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥ तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥ जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥ तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी ख़ासी॥ जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥ विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी। केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥ कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥ ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥ क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥ चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥ जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥ स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥ तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥ अपनायो तोहि अन्...

राम चालीसा / चालीसा

श्री रघुवीर भक्त हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।। निशिदिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहिं होई ।। ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रहृ इन्द्र पार नहिं पाहीं ।। दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ।। तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ।। तुम अनाथ के नाथ गुंसाई । दीनन के हो सदा सहाई ।। ब्रहादिक तव पारन पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ।। चारिउ वेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखीं ।। गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ।। नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ।। राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ।। गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ।। शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ।। फूल समान रहत सो भारा । पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ।। भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहुं न रण में हारो ।। नाम अक्षुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ।। लखन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ।। ताते रण जीते नहिं कोई । युद्घ जुरे यमहूं किन होई ।। महालक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को ...

श्री कृष्ण चालीसा / चालीसा

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम। अरुण अधर जनु बिम्ब फल, नयन कमल अभिराम॥१ पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥२ जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥१ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥२ जय नट-नागर नाग नथइया। कृष्ण कन्हैया धेनु चरइया॥३ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥४ वंशी मधुर अधर धरि टेरो। होवे पूर्ण विनय यह मेरो॥५ आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥६ गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥७ राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्ती माला॥८ कुण्डल श्रवण पीत पट आछे। कटि किंकणी काछनी काछे॥९ नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥१० मस्तक तिलक, अलक घुंघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥११ करि पय पान, पूतनहि तारयो। अका बका कागासुर मारयो॥१२ मधुबन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल, लखतहिं नन्दलाला॥१३ सुरपति जब ब्रज चढ्यो रिसाई। मसूर धार वारि वर्षाई॥१४ लगत-लगत ब्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥१५ लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥१६ दुष्ट कंस अति उधम मचाय...

श्री विद्या चालीसा / चालीसा

श्री विद्या के यन्त्र में छिपे हुये सब ग्यान, श्री विद्या के भक्त को, मिलें सभी वरदान। [१] श्री विद्या! आत्मा, ललिता तू, गौरी, शान्ता, श्री माता तू। [२] महालक्षमी, सरस्वती तू। दुर्गा, त्रिपुरा, गायत्री तू। [३] पूर्ण स्रिष्टि की है तू काया, लेकिन तुझको कहते माया। [४] सत्य, चित्त, आनन्दमयी तू, पूर्ण, अनन्त, प्रकाशमयी तू। [५] भजते तुझको मन्त्रों द्वारा, तुझे खोजते यन्त्रों द्वारा। [६] तन्त्रों से भी तुझको जाना, शक्ति रूप में है पहचाना। [७] आदि, अनश्वर, परा शक्ति तू, तीन गुणों की मूल शक्ति तू। [८] नवीन होता रूप जहां पर, तेरी इच्छा शक्ति वहां पर। [९] ब्रह्माण्ड में संतुलन सारा, तेरी ग्यान शक्ति के द्वारा। [१०] गतिमय भौतिक रूप जगत के, प्रमाण तेरी क्रिया शक्ति के। [११] वाक-शक्ति प्राणी ने पाई, तेरे नाद-बिन्दु से आई। [१२] परा वाक तू, पश्यन्ती तू, तू मध्यमा, वैखरी भी तू। [१३] विश्व चेतना तुझसे आई, सारे ब्रह्माण्ड में समाई। [१४] तेरा अंश प्राण को पाकर, बनता जीव जगत में आकर। [१५] जाग्रत, सुप्त, स्वप्न में तू है, तुरिया में, समाधि में तू है। [१६] तेरा ध्यान मुनी करते हैं, तेरा गान कवी करते हैं। [१...

श्री रामदेव चालीसा / चालीसा

।। दोहा ।। जय जय जय प्रभु रामदे, नमो नमो हरबार। लाज रखो तुम नन्द की, हरो पाप का भार। दीन बन्धु किरपा करो, मोर हरो संताप। स्वामी तीनो लोक के, हरो क्लेश, अरू पाप। ।। चैपाई ।। जय जय रामदेव जयकारी। विपद हरो तुम आन हमारी।। तुम हो सुख सम्पति के दाता। भक्त जनो के भाग्य विधाता।। बाल रूप अजमल के धारा। बन कर पुत्र सभी दुख टारा।। दुखियों के तुम हो रखवारे। लागत आप उन्हीं को प्यारे।। आपहि रामदेव प्रभु स्वामी। घट घट के तुम अन्तरयामी।। तुम हो भक्तों के भयहारी। मेरी भी सुध लो अवतारी।। जग में नाम तुम्हारा भारी। भजते घर घर सब नर नारी।। दुःख भंजन है नाम तुम्हारा। जानत आज सकल संसारा।। सुन्दर धाम रूणिचा स्वामी। तुम हो जग के अन्तरयामी।। कलियुग में प्रभु आप पधारे। अंश एक पर नाम है न्यारे।। तुम हो भक्त जनों के रक्षक। पापी दुष्ट जनों के भक्षक।। सोहे हाथ आपके भाला। गल में सोहे सुन्दर माला।। आप सुशोभित अश्व सवारी। करो कृपा मुझ पर अवतारी।। नाम तुम्हारा ज्ञान प्रकाशे। पाप अविधा सब दुख नाशे।। तुम भक्तों के भक्त तुम्हारे। नित्य बसो प्रभु हिये हमारे।। लीला अपरम्पार तुम्हारी। सुख दाता भय भंजन हारी।। निर्बुद्धी भी बुद्...

श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक / चालीसा

मत्तगयन्द छन्द बाल समय रबि भक्ष लियो तब तीनहूँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहू सों जात न टारो।। देवन आनि करी बिनती तब छाँडि़ दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जगमें कपि संकट मोचन नाम तिहारो।। 1।। बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो। चैंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो।। कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास को सोक निवारो। को नहिं जानत है जगमें कपि संकट मोचन नाम तिहारो।। 2।। अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।। हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो। को नहिं जानत है जगमें कपि संकट मोचन नाम तिहारो।। 3।। रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।। चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। को नहिं जानत है जगमें कपि संकट मोचन नाम तिहारो।। 4।। बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो। लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो।। आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो। को...

श्री हनुमान चालीसा / चालीसा

दोहा श्रीगुरू चरन सरोज रज निज मन मुकुरू सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु दो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तुन जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।। || चोपाई || जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहूँ लोक उजागर।। राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै।। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन।। बिद्याबान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे का रसिया। राम लषन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामच्रंद के काज सँवारे।। लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो जस गावै। अस कहि श्रीपति कंठ लगावै।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहिसा।। जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते।। तुम उपकार सुग्रीवहिं किन्हा। राम मिलाय राजपद दीन्हा।। ...

श्री शिवाष्टक / चालीसा

श्री शिवाष्टक आदि अनादि अनंत अखंड अभेद अखेद सुबेद बतावैं। अलग अगोचर रूप महेस कौ जोगि-जति-मुनि ध्यान न पावैं॥ आग-निगम-पुरान सबै इतिहास सदा जिनके गुन गावैं। बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं॥1॥ सृजन सुपालन-लय-लीला हित जो बिधि-हरि-हर रूप बनावैं। एकहि आप बिचित्र अनेक सुबेष बनाइ कैं लीला रचावैं॥ सुंदर सृष्टि सुपालन करि जग पुनि बन काल जु खाय पचावैं। बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं॥ 2॥ अगुन अनीह अनामय अज अविकार सहज निज रूप धरावैं। परम सुरम्य बसन-आभूषन सजि मुनि-मोहन रूप करावैं॥ ललित ललाट बाल बिधु बिलसै रतन-हार उर पै लहरावैं। बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं॥ 3॥ अंग बिभूति रमाय मसान की बिषमय भुजगनि कौं लपटावैं। नर-कपाल कर मुंडमाल गल, भालु-चरम सब अंग उढ़ावैं॥ घोर दिगंबर, लोचन तीन भयानक देखि कैं सब थर्रावैं। बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं॥ 4॥ सुनतहि दीनकी दीन पुकार दयानिधि आप उबारन धावैं। पहुँच तहाँ अविलंब सुदारून मृत्युको मर्म बिदारि भगावैं॥ मुनि मृकंडु-सुतकी गाथा सुचि अजहुँ बिग्यजन गाई सुनावैं। बड़भागी नर-नारि सोई जो ...

श्री शिव चालीसा / चालीसा

दोहा अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार। बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार।। 1।। आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति-मुक्ति-दातार। करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार।। 2।। पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार। सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार।। 3।। पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार। ढरौ तुरंत स्वभाववश, नेक न करौ अबार।। 4।। जय शिव शंकर औढरदानी। जय गिरितनया मातु भवानी ।। 1 ।। सर्वोत्तम योगी योगेश्वर। सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर।। 2 ।। सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता। उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता।। 3 ।। पराशक्ति-पति अखिल विश्वपति। परब्रह्म परधाम परमगति।। 4 ।। सर्वातीत अनन्य सर्वगत। निजस्वरूप महिमा में स्थितरत।। 5 ।। अंगभूति-भूषित श्मशानचर। भुंजगभूषण चन्द्रमुकुटधर।। 6 ।। वृष वाहन नंदी गणनायक। अखिल विश्व के भाग्य विधायक।। 7 ।। व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर। रीछचर्म ओढे गिरिजावर।। 8 ।। कर त्रिशूल डमरूवर राजत। अभय वरद मुद्रा शुभ साजत।। 9 ।। तनु कर्पूर-गौर उज्ज्वलतम। पिंगल जटाजूट सिर उत्तम।। 10 ।। भाल त्रिपुण्ड मुण्डमालाधर। गल रूद्राक्ष-माल शोभाकर।। 11 ।। विधि-हरी-रूद्र त्रिविध वपुधारी। बने सृजन-पालन-लयकारी।। 12 ।। त...

श्री दुर्गा चालीसा / चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी, नमो नमो अम्बे दुःख हरनी . निराकार है ज्योति तुम्हारी, तिहूं लोक फैली उजियारी . शशि ललाट मुख महा विशाला, नेत्र लाल भृकुटी विकराला. रुप मातु को अधिक सुहावे, दरश करत जन अति सुख पावे. तुम संसार शक्ति लय कीना, पालन हेतु अन्न धन दीना. अन्नपूर्णा हु‌ई जग पाला, तुम ही आदि सुन्दरी बाला. प्रलयकाल सब नाशन हारी, तुम गौरी शिव शंकर प्यारी. शिव योगी तुम्हरे गुण गावें, ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें. रुप सरस्वती को तुम धारा, दे सुबुद्घि ऋषि मुनिन उबारा. धरा रुप नरसिंह को अम्बा, प्रगट भ‌ई फाड़कर खम्बा. रक्षा कर प्रहलाद बचायो, हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो. लक्ष्मी रुप धरो जग माही, श्री नारायण अंग समाही. क्षीरसिन्धु में करत विलासा, दयासिन्धु दीजै मन आसा. हिंगलाज में तुम्हीं भवानी, महिमा अमित न जात बखानी. मातंगी धूमावति माता, भुवनेश्वरि बगला सुखदाता. श्री भैरव तारा जग तारिणि, छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी. केहरि वाहन सोह भवानी, लांगुर वीर चलत अगवानी. कर में खप्पर खड्ग विराजे, जाको देख काल डर भाजे. सोहे अस्त्र और तिरशूला, जाते उठत शत्रु हिय शूला. नगर कोटि में तुम्ही विराजत, तिहूं लोक ...

श्री गणेश चालीसा / चालीसा

    दोहा जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥ चौपाई जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥१ जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥२ वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥३ राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥४ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥५ सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥६ धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥७ ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्घारे॥८ कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥९ एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी।१० भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥११ अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥१२ अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥१३ मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला॥१४ गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥१५ अस कहि अन्तर्धान रुप है। पलना पर बालक स्वरुप है॥१६ बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख न...