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अगर चन्दन का बण्या रे किवाड़ / निमाड़ी लोकगीत

 अगर चन्दन का बण्या रे किवाड़, बावन चन्दन की कोठड़ी, कोठड़ी मऽ बठ्या राणी रनुबाई नार हो, बाळा कुंवर की मावली। भोळा हो धणियेर, भोळा तुम्हारो राज, तो नव दिन पियर हम जावां जी। तुम देवी मूरख गंवार, नव दिन पीयर मत जाओ। तपऽ तपऽ चैत केरो घाम, कड़ी को बाळो कुम्हलई जासे तुम्हारा बाला खऽ राखो तुम्हारा पास, नव दिन पियर हम जावां जी।।

अन्त नी होय कोई आपणा / निमाड़ी लोकगीत

     अन्त नी होय कोई आपणा,     समझी लेवो रे मना भाई (१) आप निरंजन निरगुणा,     आरे सिरगुणी तट ठाढा     यही रे माया के फंद में     नर आण लुभाणा...     अन्त नी... (२) कोट कठिन गड़ चैड़ना,     आरे दुर है रे पयाला     घड़ियाल बाजत दो पहेर का     दुर देश को जाणा...     अन्त नी... (३) इस कल युग का हो रयणाँ,     आरे कोई से भेद नी कहेणा     झिलमील-झिलमील देखणा     मुख में शब्द को जपणा...     अन्त नी... (४) भवसागर का हो तैरणा,     आरे कैसे पार उतरणा     नाव खड़ी रे केवट नही     अटकी रहयो रे निदाना...     अन्त नी... (५) माया का भ्रम नही भुलणा,     आरे ठगी जायगा दिवाना     कहेत कबीर धर्मराज से     पहिचाणो ठिकाणाँ...     अन्त नी.

अनहद मन म्हारो रमी रयो / निमाड़ी लोकगीत

 अनहद मन म्हारो रमी रयो,     धुन लागी रे प्यारी (१) उस दरियाव की मछली,     आरे इस नाले में आई     नाले का पानी तोकड़ा     दरिया न समानी...     अनहद... (२) वस्तु घणी रे बर्तन छोटा,     आरे कहो कैसे समाणी     घर मे धरु तो बर्तन फुटे     बाहेर भरमाणी...     अनहद... (३) फल मीठा रे तरुवर ऊँचा,     आरे कहो कैसे रे तोड़े     अनभेदी ऊपर चड़े     गीरे धरती के माही...     अनहद... (४) बृह्मगीर बृह्मरुप है,     आरे बृह्म के हो माही     बृह्म में बृह्म मिल गये     बृह्म में समाये...     अनहद...

अमर कंट निज धाम है / निमाड़ी लोकगीत

 अमर कंट निज धाम है,     नीत नंहावण करणा (१) वासेण जाल से हो निसरी,     आरे माता करण कुवारी     कल युग म हो देवी आवियां     कलू कर थारी सेवा...     अमर कंट... (२) बड़े बड़े पर्वत फोड़ के,     आरे धारा बही रे पैयाला     कईयेक ऋषि मुनी तप करे     जल भये रे अपारा...     अमर कंट... (३) पैली धड़ ॐकार है,     ऐली धड़ रे मंन्धाता     कोट तिरत का हो नावणा     नहावे नर और नारी...     अमर कंट... (४) मंन्धाता के घाट पे,     आरे पैड़ी लगी रे पचास     आम साम रे वाण्या हाटड़ी     दूईरा पड़ रे बजार...     अमर कंट...

अमुक भाई वालई खऽ राखड़ी भरात / निमाड़ी लोकगीत

 अमुक भाई वालई खऽ राखड़ी भरात, पिया हमखऽ दे राखड़ी घड़ई देव, असी गरमी से। उंढालई सेज पिया मोहे न सुहाये, जुदा जुदा पलंग तुलई देव, असी गरमी से। चौमासा की सेज पिया मोहे न सुहाये, पिया हमखऽ ते पियर पहुँचई देव, असी गरमी से। स्याला की सेज पिया बहुत रसालई, पिया हमखऽ ते हिया सी लगई लेव, इनी गरमी से।

अरे सायबा खेलणऽ गई गनागौर / निमाड़ी लोकगीत

 अरे सायबा खेलणऽ गई गनागौर, अबोलो क्यों लियो जी महाराज।। अरे सायबा, अबोलो देवर-जेठ, सायबजी सी ना, रहवा जी महाराज।। अरे सायबा, पड़ी गेई रेशम गांठ, टूटऽ रे पण ना छूटऽ जी महाराज।। अरे सायबा, खाटो दूा अरू दही, फाट्यो रे मन ना जुड़ जी महाराज।। अरे सायबा, खेलणऽ गई गनागौर, अबोलो क्यों लियो जी महाराज।।

आपसे हो म्हारो लखपति बाप / निमाड़ी लोकगीत

 आपसे हो म्हारो लखपति बाप, साड़ी लावसे रेशमी जी।। हऊं नापूँ तो हात पचास, तोलूँ तो तोला तीस जी।। हऊँ धरूँ तो तरसऽ म्हारो जीवड़ो, पेरूँ तो खिरऽ मोतीड़ा जी।। आवसे हो म्हारो लखपति बाप, साड़ी लावसे रेशमी जी।।

आणो आयो रे पारीब्रम्ह को / निमाड़ी लोकगीत

 आणो आयो रे पारीब्रम्ह को,     आरे सासरिया को जाणो (१) चलो म्हारा संग की हो सहेलीया,     आपुण पाणी क चाला     उंडो कुवो न मुख साकड़ो     आन रेशम डोर लगावा...     आणो आयो रे... (२) चलो म्हारा संग की हो सहेलीया,     आपुण बाग म चाला     चंपा चमेली दवणो मोगरो     फूल गजरा गुथावा...     आणो आयो रे... (३) चलो म्हारा संग की हो सहेलीया,     आपुण शीश गुथावा     कछु गुथा न कछु गुथणा     मोतीयाँ भांग सवारा...     आणो आयो रे... (४) चलो म्हारा संग की हो सहेलीया,     आपुण चोली सीलावा     कछु सीवी न कछु सीवणा     चोली अंग लगावा...     आणो आयो रे... (५) कहत कबीर धर्मराज से,     साहेब सुण लेणा     सेन भगत जा की बिनती     राखो चरण आधार....     आणो आयो रे...

आया अयोध्या वाला कुवर दो / निमाड़ी लोकगीत

 आया अयोध्या वाला कुवर दो (१) राजा जनक तो जग में हो ठाड़ा     शोभा वर्णी न जाई     उठ सभा दल देखण लागी     उग्या भवन का तारा...     कुवर दो... (२) यो रे धनुष कोई सी हाले न डोले,     लख जोधा आजमाया     रावण सरीका पड्या खिसाणा     भवपती गरब हरायाँ...     कुवर दो... (३) लक्ष्मण सुणो बंधु रे भाई,     गुरु की नी आज्ञा पाई     डावी भुजा सी धरणी क तोकु     धनुष की कोण बिसात...     कुवर दो... (४) गुरु की आज्ञा पाई राम न,     चरणो म शीश नमाया     इनी रे भूमी पर है कोई योद्धा     धनुष का टुकड़ा उड़ाया     कुवर दो... (५) सिता रे ब्याही न राम घर आया,     घर-घर आनंद छाया     माता कौशल्या न आरती सजाई     राम बधाई घर लाया...     कुवर दो...

आयो-आयो चैतडल्या रो मास जी / निमाड़ी लोकगीत

 आयो-आयो चैतडल्या रो मास जी,  जँवारा जतन कर राखज्यो जी। ईसरदासजी पेचडल्या मेँ टाँक सी जी,  जँवारा जतन कर राखज्यो जी। बहू ओ गोराँदे रे चुडले रे माँय जी,  जँवारा जतन कर राखज्यो जी बेटा जी पेचडल्या मेँ टाँक सी जी,  जँवारा जतन कर राखज्यो जी। बहू रे चुडले रे माँय जी,  जँवारा जतन कर राखज्यो जी।

इनी धरती आदो नींपज्यो आदा का चिकणा ते पान जी / निमाड़ी लोकगीत

 इनी धरती आदो नींपज्यो, आदा का चिकणा ते पान जी। इनी कूक दुल्लवजी नींपज्या, माँगऽ माँग छे कन्या को दानजी। कन्या को दान ते बाबुल बहोत दोयलो, मूरख सी दियो नी जाय। लड़की कांय खऽ पाळई रे बाबुल, कांय खऽ पोसी, कांय खऽ पायो जी काचो दूध।। माया खऽ पाळई रे बाबुल, माया खऽ पोसी, माया खऽ पायो काचो दूध जी। चरवो भी दियो रे बाबूल, गंगाळ भी दीनी, तो भी नी समझ्या दयालजी।

आव रे चांद भैंसी बान्ध / निमाड़ी लोकगीत

 आव रे चांद, भैंसी बान्ध। चन्दा बाबा चन्दी दऽ घीं मऽ रोटी वालई दऽ। नाना भाई खऽ भावऽ नी, न झुमका लाड़ी आवऽ नी।"

उच्चो सो पीप्पल कोपळयो हो देवी / निमाड़ी लोकगीत

 उच्चो सो पीप्पल कोपळयो हो देवी, वहाँ बठी गाय गोठाण। चादर पिछोड़ी को गाळयो हो देवी, रनुबाई भात लई जाय। अवतज जो धणिएरजी न देखिया, हो राजा- एक जो मारी, दूसरी, न हो राजा तीसरी मऽ जोड़या दुई हाथ। जो तुम धणियेर सोठी मारसो हो राजा नहीं म्हारो माय न बाप, नहीं हमारी माय न मावसी हो राजा, कुण म्हारो आणो लई जाय। कलयुग म अमुक भाई मानवी राजा ऊ तुम्हारो आणो लई जाय। अमुक भाई दीसे तुमख बाजुट हो राजा लाड़ीबाई लागसे तुम्हारा पाँय।

घोड़ी बठी नऽ धणियेरजी आया / निमाड़ी लोकगीत

 घोड़ी बठी नऽ धणियेरजी आया, रनुबाई करऽ सिंगार हों चंदा कसी भरी लाऊं जमुना को पाणी, घर म्हारो दूर घागर म्हारी भारी, घाटी घढ़ी हाऊं हारी चंदा कसी भरी लाऊँ जमुना को पाणी।

चन्दन से भरी हो तळाई / निमाड़ी लोकगीत

 चन्दन से भरी हो तळाई, राणी रनुबाई पाणी खऽ संचरिया। आगऽ जाऊँ तो डर भय लागऽ, पाछऽ रहूँ तो घागर नहीं डूबऽ सिर लेऊँ तो बाजूबंद भींजऽ कड़ऽ लेऊं तो बाळों रड़ऽ

चन्दरमा निरमळई रात / निमाड़ी लोकगीत

 चन्दरमा निरमळई रात, तारो कँवऽ उँगसे? तारो ऊँगसे पाछली रात, पड़ोसेण जागसे जी।। धमकसे मही केरी माट, धमकसे घट्टीलो जी, ईराजी घर आवसे, रनुनाई खऽ आरती जी।।

घर की मांडण बेटी अमुक बाई दीनी / निमाड़ी लोकगीत

 घर की मांडण बेटी अमुक बाई दीनी, तवंऽ जाई समझ्या दयालजी। आला नीळा बाँस की बाँसरी, वो भी बाजती जाय, अमुक भाई की बईण छे लाड़ली, वो भी सासरऽ जाय, पछा फिरी, पछा फिरी लाड़ीबाई, पिताजी खऽ देवो आशीस। खाजो पीजो पिताजी, राज करजो, जिवजो ते करोड़ बरीस।। छोड्यो छे मायको माहिरो, छोड्यो पिताजी को लाड़ छोड़ी छे भाई केरी भावटी, छोड्यो फुतळयारो ख्याल। छोड्यो छे सई करो सईपणो, लाग्या दुल्लवजी का साथ।

गोर ए गणगौर माता खोल किँवाडी / निमाड़ी लोकगीत

 पूजा शुरु करने के पहले - गोर ए गणगौर माता खोल किँवाडी,  बाहर ऊबी थारी पूजन वाली,  पूजो ए पुजावो सँइयो काँई-काँई माँगा,  माँगा ए म्हेँ अन-धन लाछर लिछमी जलहर जामी बाबुल माँगा,  राताँ देई माँयड,  कान्ह कँवर सो बीरो माँगा,  राई (रुक्मणी) सी भौजाई,  ऊँट चढ्यो बहनोई माँगा,  चूनडवाली बहना,  पून पिछोकड फूफो माँगा,  माँडा पोवण भूवा,  लाल दुमाल चाचो माँगा,  चुडला वाली चाची,  बिणजारो सो मामो माँगा,  बिणजारी सी मामी,  इतरो तो देई माता गोरजा ए,  इतरो सो परिवार,  दे ई तो पीयर सासरौ ए,  सात भायाँ री जोड परण्याँ तो देई माता पातळा (पति) ए,  साराँ मेँ सिरदार पूजा शुरु करते हैँ - ऊँचो चँवरो चौकुटो,  जल जमना रो नीर मँगावो जी,  जठे ईसरदासजी सापड्या (विराजे हैँ),  बहू गोराँ ने गोर पुजावो जी,  जठे कानीरामजी सापड्या बहु लाडल ने गोर पुजावो जी,  जठे सूरजमलजी सापड्या,  बाई रोवाँ ने गोर पुजावो जी,  गोर पूजंता यूँ कैवे सायब या जोडी इभ् छल (इसी तरह) राखो जी,  या जोडी इभ् छल राख...

गाड़ा जुप्या रे देव गाडुला / निमाड़ी लोकगीत

 गाड़ा जुप्या रे, देव, गाडुला नांदिया घूघर माल, धवळा घोड़ा को रे म्हारो उंकार देव, तुम पर उड़ऽ रे निशाण, आवऽ तेखऽ रे देव, आवणऽ दीजो, आड़ी नारेल की माल।

गढ़ रे गुजरात सु देव गणपति आया हो / निमाड़ी लोकगीत

 गढ़ रे गुजरात सु देव गणपति आया हो आई नऽ उतर्या ठण्डा वड़ तळऽ पूछतऽ पूछतऽ गाँव मऽ आया हो नगर मऽ आया हो भाई हो मोठाजी भाई को घर कहाँ छे? आमी सामी वहरी नऽ लम्बी पटसाळ हो, केल जऽ झपकऽ उनका आंगणा मऽ सीप भरी सीरीखण्ड थाक भरी मोतीड़ा गणेश बधावण मोटी बैण संचरिया।